Karmkand

हिन्दुओं में विभिन्न अवसरों पर की जाने वाली पारम्परिक पूजा-ऋचा का क्रियात्मक रूप कर्मकांड कहलाता है।

नकश्चिद्वेद च वेदसमन्र्ता चतुर्मुखः। नकश्चिद्वेदकर्ता च वेद स्मर्ता चतुर्मुखः।।

वेद को बनाने वाला कोई नहीं है। चतुर्मुख ब्रह्मा ने वेद का स्मरण किया। ठीक उसी प्रकार यज्ञ अनुष्ठान, कर्मकांड भी अपौरूषेय, नित्य और अनादि हैं। ऋग्वेद के प्रथम मंत्र ‘अग्निमीडे पुरोहितम’’ में यज्ञ (कर्मकांड) पद आया है अतः सिद्ध होता है कि वेद से भी प्राचीन कर्मकांड है। कर्मकांड वैदिक संस्कृति का प्रधान अंग है। कर्मकांड से ही समस्त मनुष्यों की कामनायें सिद्ध होती हैं। कर्मकांड, मनुष्यों की इच्छित कामना एवं कल्याण व लौकिक सुख-शांति तथा मन में संकल्पित अनेकानेक इच्छाओं को पूर्ण करता है। हमारे धर्माचार्यों ने मनुष्य के लिए जितने भी धर्म कहे हैं वे सभी कर्मकांड लक्षण से संयुक्त हैं| प्राचीन ऋषि महर्षियों ने शास्त्रों के अनुसार ही अपना जीवन यज्ञमय बनाया था। वे यज्ञ कर्मकांड द्वारा अपना और जगत का कल्याण किया करते थे। वस्तुतः कर्मकांड में अपूर्व शक्ति है। ‘कर्मकांड से जो जिस वस्तु की प्राप्ति के लिए इच्छा करता है वह उसको वही वस्तु देता है।’ ‘‘यो यदिच्छति तस्य तत्’’। (कठोपनिषद) 12/16 अतः स्पष्ट है कि संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो कर्मकांड के द्वारा प्राप्त न हो सके। कर्मकांड से केवल लौकिक, धनधान्य, संतति आदि वस्तुओं की ही नहीं अपितु पारलौकिक ‘मोक्ष’ आदि पदार्थों की भी प्राप्ति होती है। इस श्रेष्ठ कर्म के विधि-विधान भी अत्यंत कठिन हैं।

कर्मकांड के तीन विशेष अंग है।

1. कंडी,

2. पिंडी

3. चंडी

कंडी (कुष्कंडिका): हवन से पूर्व जो कर्म हैं वह कंडी हैं।

पिंडी: श्राद्धादि में जो पिण्डादि क्रिया होती है उसको पिंडी कहते हैं।

चंडी: भगवती दुर्गा जी की उपासना के जो अनुष्ठान व अन्य क्रियाएं हैं उनको चंडी कहते हैं।

जो साधक कर्मकांड के इन तीन अंगों से भली भांति परिचित है, गुरु परंपरा से जिसने शिक्षा प्राप्त की है वह कर्मकांड कराने व आचार्य कहलाने का अधिकारी हो सकता है। ‘‘श्रम मात्रैक केवलं’’ वह सिर्फ श्रम मात्र है। कहा गया है इसलिए नियमित रूप से सन्ध्या वन्दनादि करने वाले, वेदपाठी व नित्य ही अपने अनुष्ठान में रत ब्राह्मण द्वारा संपन्न की गई कर्मकांड क्रिया ही फलीभूत होती है।