Nava grah shanti vidhan

[: भाग्योदय एवं दु:खों से निवृत्ति हेतु ग्रह शांति यज्ञ विधि ।।

भाग्योदय एवं दु:खों से निवृत्ति हेतु ग्रह शांति यज्ञ विधि ।। Graha Dosha Nivaran Vidhi.

मित्रों, आज मैं आपलोगों को एक ऐसा उपाय बताता हूँ, जो पूर्ण प्रमाणिक है । इसका वर्णन आग्नेय महापुराण के एक सौ चौसठवें अध्याय में वर्णित हैं ।।
आग्नेय पुराण के १६४वें अध्याय के श्लोक संखया एक से लेकर चौदह तक में ग्रह शांति के विधान हवन, मंत्र, समिधाएं, साकल्य आदि का स्पष्ट वर्णन किया गया है ।।
मित्रों, ग्रहों को चढ़ने वाले भोग तथा दान का भी विधान बताया गया है । तीर्थराज पुष्करजी द्वारा भगवान परशुराम को बताये गये ये उपाय इस प्रकार हैं ।।
लक्ष्मी, शांति, पुष्टि, वृद्धि तथा आयु की कामना रखने वाले वीर पुरुषों को ग्रहों की पूजा करनी चाहिये । ग्रह स्थापना क्रम से करके सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु एवं केतु की प्रतिमाएं भी इसी क्रमानुसार पृथक पृथक धातु से बनवानी चाहिएं ।।
नवग्रह बेदी निर्माण हेतु मैंने अपने ब्लॉग पर इस लेख के साथ ही वो प्रतिमा भी पोस्ट किया है, आप वहाँ देखें । सूर्य की तांबे से, चंद्रमा की स्फटिक या चांदी से ।।
मंगल की लाल चंदन से, बुध की रजत से, बृहस्पति की स्वर्ण से, शुक्र की रजत से, शनि की लोहे से तथा राहु-केतु की सीसे से बनाएं अथवा नवग्रह यन्त्र पर भी पूजन कर सकते हैं ।।
मित्रों, ग्रहों के उनके रंगों के अनुसार ही उनकी पूजा सामग्री भी होनी चाहिए । इस पूजा से शुभत्व की प्राप्ति होती है । इस प्रकार ग्रहों के वैदिक मन्त्र जो यजुर्ववेद से लिये गये और समिधायें (लकड़ियां) जिससे ग्रह शांति हेतु हवन की जाती है ।।
समिधाओं के नाम क्रमशः इस प्रकार है – आक, पलाश, खैर, अपामार्ग, पीपल, गूलर, शमी, दूर्बा और कुशा है । इन लकड़ियों से अग्नि जलाकर प्रत्येक ग्रह की शांति के लिए शहद, घी, दही या खीर की आहूति भी देने का विधान है ।।
मित्रों, विभिन्न ग्रहों के लिए पृथक-पृथक भोग सामग्री भी बतायी गई हैं । सूर्य के लिए गुड़ मिलाया हुआ भात, चंद्र-खीर, मंगल-लापसी (गुड़ का बना मिठा दलिया) ।।
बुध के लिए साठी के चावल की खीर, गुरु के लिए दही चावल, शुक्र-घी-भात, शनि-तिल मिश्रित भात, राहु के लिए उड़द मिश्रित भात तथा केतु के लिए सप्तधान्य की खिचड़ी ।।
इन भोज्य पदार्थों से ये विशिष्ट भोग समर्पित करें तथा ब्राह्मण को भी विशिष्ट भोज्य पदार्थों का भोजन अवश्य करवायें । इसके पश्चात ग्रहों की दक्षिणा भी बतायी गई है ।।
मित्रों, किस ग्रह की पूजा करनी चाहिए यह बताया गया है । राशी के आधार पर जिनकी कुण्डली न हो, उस व्यक्ति की राशि से अष्टम राशि में जो ग्रह स्थित है उसकी पूजा, यज्ञ, शांति अवश्य करानी चाहिए ।।
इतना ही नहीं जन्मकुंडली में अष्टम भाव में स्थित ग्रह की एवं अष्टम भाव में स्थित राशि के स्वामी ग्रह की भी पूजा करवाने से शुभ फल की प्राप्ति होती है ।।
इसके अलावा किसी कुशल ज्योतिषी से अपनी जन्मकुण्डली दिखाकर मारकेश गृह तथा दूषित ग्रहों की यथाविधानेन शान्तिकर्म एवं हवन-यज्ञादि करवायें ।।
मित्रों, ब्रह्माजी ने इन सभी ग्रहों को वरदान दिया है कि जो तुम्हारी पूजा, यज्ञादि करता है उनके सभी मनोरथ की पूर्ति सम्मानपूर्वक तुम्हें करना ही होगा यही तुम्हारा कर्तब्य होना चाहिए ।।
अतः शास्त्रोक्त विधि से पूजन, हवन आदि करने से ग्रहों की अनुकूलता अवश्य प्राप्त होती है । इस प्रकार पुराणोक्त विधि के अनुसार तथा यजुर्वेद के मंत्रों से ग्रहों के उपाय किये जाने से शुभ फल की प्राप्ति अवश्य होती है ।।
इसके अतिरिक्त नारद पुराण में भी ग्रहों तथा नक्षत्रों के वृक्ष, वनस्पतियों के बारे में भी वर्णन मिलता है । नारद पुराण के अनुसार विधिवत उपाय करने से भी ग्रहों की अनुकूलताएं प्राप्त की जा सकती हैं ।।
जन्म पत्रिका या जन्म राशि के अनुसार शुभ-अशुभ ग्रहों का गहनता से विश्लेषण करके ही उपाय करवायें । अशुभ ग्रह की शांति एवं शुभता प्रदान करने वाले ग्रह की वृद्धि की जानी चाहिए ।।
मित्रों, इन दोनों के उपाय समान नहीं पृथक-पृथक होते हैं । तीसरे, छटे, आठवें तथा बारहवें भाव में स्थित ग्रह की प्रकृति के अनुसार यह निर्णय लिया जाना चाहिए कि इसकी शांति की जाए या पुष्टि ।।
ग्रहों की शांति करानी हो या पुष्टि, विधिवत वेदोक्त पद्धति से ही करवानी चाहिए । इसके लिए कोई एक जानकर ज्योतिषी जिसे वैदिक ज्योतिष एवं विधान की जानकारी हो वो वेदपाठी ब्राह्मणों से करवाए ।।
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