Shravan Mas

पूर्णमासी को श्रवण नक्षत्र का योग होने के कारण यह मास श्रावण कहलाता है।

श्रावण मास भक्ति के लिए सर्वोत्तम है। इस महीने में जो भी भक्ति भाव के साथ शिवजी की आराधना करता है वह उनकी कृपा प्राप्त करता है। मात्र बिल्व पत्र और जलाभिषेक से इस माह में शिव की अनुकंपा प्राप्त की जा सकती है।

यह जगत भगवान शिव की ही सृष्टि है। शिव का अर्थ ही है परम कल्याणकारी। वे ऐसे देव हैं जो लय और प्रलय को अपने अधीन किए हैं। शिव ऐसे देव हैं जिनमें परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है।

उनके मस्तक पर चंद्र है तो गले में विषधर। वे अर्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं। गृहस्थ हैं तो श्मशानवासी और वीतरागी भी। सौम्य आशुतोष हैं तो भयंकर रुद्र भी। देवशयनी ग्यारस के साथ ही जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं तो शिव सृष्टि के पालनकर्ता की भूमिका संभालते हैं। यही वजह है कि श्रावण में भगवान भोलेनाथ की आराधना की जाती है। उनकी स्तुति से दिशाएं गुंजायमान रहती हैं।

जप, तप और व्रत के लिए सर्वोत्तम पूर्णमासी को श्रवण नक्षत्र का योग होने के कारण यह मास श्रावण कहलाता है। इस मास की संपूर्ण कला केवल ब्रह्मा जी ही जानते हैं। इस मास के पूरे तीस दिन जप, तप, व्रत व पुण्य कार्यों के लिए उत्तम माने गए हैं। शिवजी को यह मास सर्वाधिक प्रिय है।

वर्षा ऋतु के चार महीनों में भी श्रावण मास में शिवजी की आराधना और स्तुति का विशेष महात्म्य माना गया है। शिव भक्त इस मास में तरह-तरह से भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के जतन करते हैं।

भगवान शिव ने स्वयं अपने मुख से ब्रह्मा जी के मानस पुत्र सनतकुमार से कहा कि मुझे 12 महीनों में सावन विशेष प्रिय है। जब सनत कुमारों ने भगवान शिव से पूछा कि उन्हें सावन मास इतना प्रिय क्यों है तो शिव ने बताया कि देवी सती ने जब अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति के रूप में शरीर त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को हर जन्म में पति रूप में पाने का प्रण किया था।

अपने दूसरे जन्म में देवी सती ने पार्वती के नाम से हिमाचल और रानी मैना के घर जन्म लिया। पार्वती ने युवावस्था में एक माह निराहार रहकर कठोर व्रत किया और शिव को प्रसन्न कर उनसे विवाह किया, जिसके बाद से ही यह माह मुझे सभी मास में अत्यंत प्रिय हो गया।

यह भी कहा गया है कि मरकंडू ऋषि के पुत्र मार्कण्डेय ने लंबी आयु के लिए श्रावण मास में ही घोर तप किया था और शिव को प्रसन्ना किया था। शिव ने उन्हें वरदान में ऐसी शक्तियां दीं जिनके आगे यमराज भी नतमस्तक हो गए थे।

 इसलिए करते हैं जलाभिषेक

पौराणिक कथाओं के अनुसार श्रावण मास में ही समुद्र मंथन किया गया था। मंथन से जो हलाहल विष निकला उसे भगवान शिव ने कंठ में समाहित कर सृष्टि की रक्षा की थी। विष के प्रभाव से कंठ नीला पड़ जाने के कारण शिव ‘नीलकंठ’ कहलाए।
विष के प्रभाव को कम करने के लिए सभी देवताओं ने शिवजी को जल अर्पित किया। यही वजह है कि श्रावण मास में शिवजी को जल चढ़ाने का विशेष महत्व है। इस महीने में गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र, शतरूद्रिपाठ और पुरुषसूक्त का पाठ एवं पंचाक्षर और षडाक्षर आदि शिव मंत्रों व नामों का जप विशेष फल देने वाला है। इस पूरे मास जो भी निष्काम भाव से भगवान शिव की भक्ति करता है उसे शिव की कृपा प्राप्त होती है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं।

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